इंट्राडे ट्रेडिंग का मतलब है – शेयर को उसी दिन खरीदना और बेचना, यानी जिस दिन आपने शेयर खरीदा, उसी दिन उसे बेच भी दिया। इसमें शेयर का वास्तविक डिलीवरी नहीं ली जाती, बल्कि केवल प्राइस मूवमेंट से लाभ (या हानि) कमाया जाता है।इसे ‘सट्टा व्यापार’ (Speculative Business) क्यों कहा जाता है?
इनकम टैक्स अधिनियम, 1961 के अनुसार, इंट्राडे ट्रेडिंग को सट्टा व्यापार (speculative business) माना जाता है क्योंकि इसमें प्रोडक्ट का फिजिकल डिलीवरी नहीं होता।यह शुद्ध रूप से प्राइस स्पेक्युलेशन पर आधारित होता है, इसमें रियल टाइम रिस्क ज्यादा होता है।यह एक अनुमान आधारित जोखिमपूर्ण व्यापार है, इसलिए इसे “सट्टा” माना जाता है।
यह एक बहुत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक विषय है, खासकर भारत के खुदरा निवेशकों (retail investors) के लिए जो शेयर बाजार में एक्टिव हैं, लेकिन टैक्स नियमों को सही से नहीं समझते।
कम कमाई ≠ कम टैक्स: खुदरा निवेशकों के लिए एक चेतावनी है क्योंकि 🔍 हाल ही में सुजीत भंगार (TaxBuddy.com के फाउंडर) ने हाल ही में एक केस शेयर किया जिसमें एक फुल-टाइम निवेशक ने ₹7 लाख का नेट प्रॉफिट कमाया था। उसे लगा कि उसकी टैक्स देनदारी “शून्य”होगी क्योंकि आय ₹12 लाख से कम थी।उसे ₹74,375 का टैक्स नोटिस मिला।गलती कहा हई प्रॉब्लम इनकम की राशि में नहीं थी, बल्कि उसके “क्लासिफिकेशन” में थी।शेयर मार्केट की आय (जैसे इंट्राडे ट्रेडिंग, F&O, कैपिटल गेन) को अलग-अलग तरीके से टैक्स किया जाता है।सिर्फ यह सोच लेना कि “₹12 लाख से कम है, इसलिए टैक्स नहीं लगेगा” – एक खतरनाक भ्रम है।
नए ट्रेडर्स अक्सर इसे इन्वेस्टमेंट समझ लेते हैं, जबकि टैक्स की नजर में यह अलग है।कई मामलों में ट्रेडर्स रिटर्न दाखिल नहीं करते और carry forward का फायदा खो देते हैं।साथ ही, यदि आप लगातार इंट्राडे में एक्टिव हैं, तो ITR फॉर्म और ऑडिट की आवश्यकता भी उत्पन्न हो सकती है।

🛑 इसलिए ध्यान रखें,आय का मतलब कम टैक्स नहीं होता।इनकम के प्रकार और उसकी टैक्स क्लासिफिकेशन को समझें।

✅ ITR फॉर्म का सही चुनाव करें।
✅ प्रोफेशनल टैक्स एडवाइज़र से सलाह लें, खासकर अगर आप शेयर बाजार या ट्रेडिंग से नियमित आय कमा रहे हैं।
| आय का प्रकार | टैक्स कैसा लगता है? |
| इंट्राडे ट्रेडिंग | सट्टा व्यापार आय (speculative business) – स्लैब दर पर टैक्स |
| F&O ट्रेडिंग | गैर-सट्टा व्यापार (non-speculative) – स्लैब दर पर टैक्स |
| लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) | ₹1 लाख तक टैक्स फ्री, उसके ऊपर 10% |
| शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) | 15% टैक्स |
| डिविडेंड इनकम | आपकी कुल आय में जुड़ती है – स्लैब रेट के अनुसार टैक्स |
इसलिए ध्यान रहे इनकम कितनी है, इससे ज्यादा जरूरी है वो कहां से आई है टैक्स उसी पर निर्भर करता है।

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