महाराष्ट्र राज्य में Pharmacy कॉलेजों की संख्या में अनियंत्रित वृद्धि हुई, जिसके कारण शिक्षा की मांग नहीं बनी और 26–32% सीटें खाली पड़ीं।सरकार ने PCI को अगले 5 वर्षों तक नए कॉलेजों पर रोक लगाने का प्रस्ताव भेजा, ताकि मौजूदा संस्थानों की गुणवत्ता सुधारी जा सके और विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा मिल सके।। स्थिति अब गंभीर मोड़ पर पहुँच चुकी है। केवल २०२४-२५ शैक्षणिक वर्ष में ही फार्मेसी पाठ्यक्रमों में २६,००० से अधिक सीटें खाली रह गईं जिनमें से १४,००० सीटें बैचलर ऑफ फार्मेसी (B.Pharm) कार्यक्रमों में और १२,४०० सीटें डिप्लोमा इन फार्मेसी (D.Pharm) पाठ्यक्रमों में थीं।
इसके बावजूद, इस वर्ष ६१ नए फार्मेसी कॉलेजों को मंज़ूरी दी गई, जिससे सीटों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई पिछले वर्ष की ४२,७९१ सीटों से बढ़कर इस वर्ष ५०,१७९ सीटें हो गईं।ऐसी ही स्थिति पिछले वर्ष भी देखने को मिली थी, जब आखिरी समय में नए कॉलेजों को मंजूरी दे दी गई थी।
ऑल इंडिया फार्मेसी टीचर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर मिलिंद उमेकर ने कहा, “राज्य में फार्मेसी कॉलेजों की बढ़ती संख्या ने फार्मेसी शिक्षा की गुणवत्ता और समग्र शैक्षणिक स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। यह ज़रूरी है कि शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाए जाएं।”उन्होंने यह भी कहा कि फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को कॉलेजों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए, जिसमें फैकल्टी, आधारभूत संरचना और उपकरणों की उपलब्धता जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं का मूल्यांकन किया जाए। उमेकर ने आगे कहा, “कुछ साल पहले इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली थी। अगर समय रहते इस स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप कर फार्मेसी कॉलेजों की अनियंत्रित वृद्धि को रोकना चाहिए।उन्होंने यह भी ज़ोर दिया कि सरकारी अस्पतालों में फार्मासिस्ट के पद खाली पड़े हैं, और निजी क्षेत्र में भी नौकरियों की संभावनाएं कम हो रही हैं।फार्मेसी कॉलेजों की बेतहाशा वृद्धि के चलते बेरोजगार स्नातकों की संख्या बढ़ सकती है और फार्मेसी शिक्षा का मूल्य गिर सकता है,उन्होंने चेतावनी दी।


फार्मेसी में पढ़ते हुए विद्यार्थियों की बढ़ती चिंताए बताती है की ऐसे में 🧑🎓 1. शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट होती दिख रही है, जब बहुत अधिक कॉलेज बिना जरूरी संसाधनों (जैसे योग्य फैकल्टी, प्रयोगशालाएं, उपकरण) के खुल जाते हैं, तो छात्रों को पूरी जानकारी और व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिल पाता।उससे नुकसान ये है अधूरी या कमजोर शिक्षा और इंडस्ट्री की ज़रूरतों को पूरा न कर पाने वाला ज्ञान ना मिल पाना।💼 2. नौकरियों की कमी और बेरोजगारी ज्यादा कॉलेज,ज्यादा ग्रेजुएट्स, लेकिन सरकारी व निजी क्षेत्रों में उतनी नौकरियाँ नहीं हैं। उसकी वजह से नुकसान ये है की डिग्री होने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती,उच्च शिक्षा में पैसा व समय खर्च करके भी करियर में स्थिरता नहीं मिल पा रही 🏥 3. सरकारी अवसरों की अनुपलब्धता सरकारी अस्पतालों में फार्मासिस्ट के हज़ारों पद खाली पड़े हैं, लेकिन भर्ती नहीं हो रही।इसकी वजह से योग्य छात्र सरकारी सेवा में आने से वंचित रह जाते है और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था भी प्रभावित भी हो पाती।🎓 4. डिग्री का महत्व घटता है जब शिक्षा का स्तर नीचे जाता है और ग्रेजुएट्स की संख्या बहुत अधिक हो जाती है, तो फार्मेसी डिग्री की प्रतिष्ठा कम हो जाती है।इसी वजह से फार्मेसी की सामाजिक और पेशेवर पहचान पर असर हो रहा है पढ़ाई में अच्छे होने बावजूद बच्चों की मेहनत और योग्यता का सही मूल्य नहीं मील पायेगी, ⚠️ 5. आर्थिक और मानसिक तनाव छात्र और उनके परिवार फार्मेसी की पढ़ाई पर भारी खर्च करते हैं। अगर बाद में नौकरी या करियर न बने, तो मानसिक और आर्थिक तनाव होता है।

समाधान केवल यही है गुणवत्ता-युक्त कॉलेजों को ही अनुमति मिले
• PCI नियमित निरीक्षण करे
• सरकार नौकरियाँ उपलब्ध कराए
• छात्रों को इंडस्ट्री की ज़रूरतों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाए


सरकार के इस फैसले का किताना असर होता है आगे देखने को मिलेगा ही पर हमारी शिक्षा ही हमारा भविष्य है।

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